Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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बीरबल ने उपेक्षा की-मैं इसे अपनी जवाँमर्दी नहीं, अपना कमीनापन
समझता हूँ।
कांस्टेबल ने फिर खुशामद की-बड़ा सरकश आदमी था हुजूर!
बीरबल ने तीव्र भाव से कहा--चुप रहो! जानते भी हो, सरकश किसे कहते
हैं? सरकश वे कहलाते हैं, जो डाके मारते हैं, चोरी करते हैं, खून
करते हैं; उन्हें सरकश नहीं कहते, जो देश की भलाई के लिए अपनी जान
हथेली पर लिये फिरते हों। हमारी बदनसीबी है कि जिनकी मदद करनी
चाहिए, उनका विरोध कर रहे हैं। यह घमण्ड करने और खुश होने की बात
नहीं है, शर्म करने और रोने की बात है।
स्नान समाप्त हुआ। जुलूस यहाँ से फिर रवाना हुआ।
( ५ )
शव को जब खाक के नीचे सुलाकर लोग लौटने लगे तो दो बज रहे थे। मिट्ठन
बाई स्त्रियों के साथ-साथ कुछ दूर तक तो आयी; पर क्वीन्स पार्क में
आकर ठिठक गयी। घर जाने की इच्छा न हुई। वह जीर्ण, आहत, रक्तरञ्जित
शव, मानो उसके अन्तस्तल में बैठा उसे धिक्कार रहा था। पति से उसका
मन इतना विरक्त हो गया था कि अब उसे धिक्कारने की भी उसकी इच्छा न
थी। ऐसे स्वार्थी मनुष्य पर भय के सिवा और किसी चीज का असर हो सकता
है, इसका उसे विश्वास ही न था।
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