Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी। कम्पनी की फ़ौजै
लखनऊ की तरफ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हलचल मची हुई थी। लोग
बाल-बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे। पर हमारे दोनों
खिलाड़ियों को इसकी जरा भी फिक्र न थी। वे घर से आते, तो गलिया में
होकर। डर था कि कहीं किसी बादशाही मुलाजिम की निगाह न पड़ जाय, तो
बेगार में पकड़ जायँ। हजारों रुपए सालाना की जागीर मुफ्त ही में हजम
करना चाहते थे।
एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खँडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे।
मिर्जा की बाजी कुछ कमजोर थी। मीर साहब उन्हें किश्त-पर-किश्त दे
रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखायी दिये। यह गोरों की
फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार जमाने के लिए आ रही थी।
मीर साहब बोले--अँगरेजी फौज आ रही है। खुदा खैर करे।
मिर्जा--आने दीजिए, किश्त बचाइए। लो यह किश्त।
मीर--ज़रा देखना चाहिए--यहीं आड़ में खड़े हो जायँ।
मिर्जा--देख लीजिएगा, जल्दी क्या है, फिर किश्त।। मीर--तोपखाना भी
है। कोई पाँच हजार आदमी होंगे। कैसे जवान हैं। लाल बंदरों
के-से-मुँह हैं। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।
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