本 · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
251ページ中133ページ
著者: प्रेमचंद
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'शौक से अदालत जाइए; अगर मेरे लड़के मेरी बीवी, या मेरे नाम लॉटरी
निकली तो आपका उससे कोई सम्बन्धन होगा, उसी तरह जैसे आपके नाम लॉटरी
निकले, तो मुझसे, मेरी बीवी से या मेरे लड़के से उससे कोई सम्बन्ध न
होगा।'
'अगर मैं जानता आपकी ऐसी नीयत है, तो मैं भी बीवी-बच्चों के नाम से
टिकट ले सकता था।'
'यह आपकी गलती है।
'इसी लिए कि मुझे विश्वास था, आप भाई हैं।'
'यह जुआ है, आपको समझ लेना चाहिए। जुए की हार-जीत का खानदान पर कोई
असर नहीं पड़ सकता; अगर आप कल को दस-पाँच हजार रेस मै हार आयें, तो
खानदान उसका जिम्मेदार न होगा।'
'मगर भाई का हक दबाकर आप सुखी नहीं रह सकते।'
'आप न ब्रह्मा हैं, न ईश्वर, न कोई महात्मा।'
विक्रम की माता ने सुना कि दोनों भाइयों में ठनी हुई है औरम
ल्लयुद्ध हुआ चाहता है, तो दौड़ी हुई बाहर आयीं और दोनों को समझाने
लगीं।
छोटे ठाकुर ने बिगड़कर कहा-आप मुझे क्या समझाती हैं, उन्हें समझाइए,
जो चार-चार टिकट लिये बैठे हुए हैं। मेरे पास क्या है, एक टिकट।
उसका क्या भरोसा! मेरी अपेक्षा जिन्हें रुपये मिलने का चौगुना चांस
है, उनकी नीयत बिगड़ जाय, तो लज्जा और दुःख की बात है।
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