本 · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
251ページ中246ページ
著者: प्रेमचंद
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चौधरी-तो क्या तुमने दोहरी फीस लेने की ठानी है?
आबदी-आगर आपको सौ दफे गरज हो तो! वरना मेरे १००) तो कहीं गये ही
नहीं। मुझे क्या कुत्ते ने काटा है, जो लोगों की जेब में हाथ डालती
फिरूँ? चौधरी की एक न चली। आबदी के सामने दबना पड़ा। नाच शुरू हुआ।
आबदीजान बला की शोख औरत थी। एक तो कमसिन उस पर हसीन। और उसकी अदाएँ
तो गजब की थीं कि मेरी तबीयत भी मस्त हुई जाती थी। आदमियों को
पहचानने का गुण भी उसमें कुछ कम न था। जिसके सामने बैठ गयी, उससे
कुछ-न-कुछ ले ही लिया। पाँच रुपये से कम तो शायद ही किसी ने दिये
हों। पिताजी के सामने भी वह जा बैठी। मैं तो मारे शर्म के गड़ गया।
जब उसने उनकी कलाई पकड़ी, तब तो मैं सहम उठा। मुझे यकीन था कि
पिताजी उसका हाथ झटक देंगे और शायद दुत्कार भी दें; किन्तु यह क्या
हो रहा है! ईश्वर! मेरी आँखें धोखा तो नहीं खा रही हैं! पिताजी
मूँछों में हँस रहे हैं। ऐसी मृदु हँसी उनके चेहरे पर मैंने कभी
नहीं देखी था। उनकी आँखों से अनुराग टपका पड़ता था। उनका एक-एक रोम
पुलकित हो रहा था; मगर ईश्वर ने मेरी लाज रख ली। वह देखो, उन्होंने
धीरे से आबदी के कोमल हाथों से अपनी कलाई छुड़ा ली। अरे!
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