도서 · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
251페이지 중 132페이지
저자: प्रेमचंद
시간0:00
속도 (WPM)0.0
정확도100.0%
시작을 누르고 줄을 정확히 입력하세요. · 백스페이스 비활성화 — 오류 후에도 계속 입력하세요.
सहसा दीवानखाने में झड़प की आवाज सुनकर मेरा ध्यान उधर चला गया।
यहाँ दोनों ठाकुर बैठा करते थे। उनमें ऐसी मैत्री थी, जो आदर्श
भाइयों में हो सकती है। राम और लक्ष्मण में भी इतनी ही रही होगी।
भड़प को तो बात ही क्या, मैने उनमें कभी विवाद होते भी न सुना था।
बड़े ठाकुर जो कह दें, वह छोटे ठाकुर के लिए कानून था और छोटे ठाकुर
की इच्छा देखकर ही बड़े ठाकुर कोई बात कहते थे। हम दोनों को आश्चर्य
हुआ। दीवानखाने के द्वार पर जाकर खड़े हो गये। दोनों भाई अपनी-अपनी
कुरसियों से उठकर खड़े हो गये थे, एक-एक कदम आगे भी बढ़ पाये थे,
आँखें लाल, मुख विकृत, त्योरियाँ चढ़ी हुई', मुट्टियाँ बँधी हुई।
मालूम होता था, बस हाथा-पाई हुआ ही चाहती है।
छाटे ठाकुर ने हमें देखकर पीछे हटते हुए कहा-सम्मिलित परिवार में जो
कुछ भी और कहीं से भी और किसी के नाम भी आये, वह सबका है, बराबर।
बड़े ठाकुर ने विक्रम को देखकर एक कदम ओर आगे बढ़ाया-हरगिज नहीं;
अगर मै कोई जुर्म करूँ, तो मैं पकड़ा जाऊँगा, सम्मिलित परिवार नहीं।
मुझे सजा मिलेगी, सम्मिलित परिवार को नहीं। यह वैयक्तिक प्रश्न है।
'इसका फैसला अदालत से होगा।'
시작을 누르고 줄을 정확히 입력하세요.
시작 안 됨