도서 · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
251페이지 중 242페이지
저자: प्रेमचंद
시간0:00
속도 (WPM)0.0
정확도100.0%
시작을 누르고 줄을 정확히 입력하세요. · 백스페이스 비활성화 — 오류 후에도 계속 입력하세요.
निषाद-नौका-लीला का दिन था। मैं दो-चार लड़कों के बहकाने में आकर
गुल्ली-डंडा खेलने लगा था। आज शृंगार देखने न गया। विमान भी निकला;
पर मैंने खेलना न छोड़ा। मुझे अपना दाँव लेना था। अपना दाँव छोड़ने
के लिए उससे कहीं बढ़कर आत्म-त्याग की जरूरत थी, जितना मैं कर सकता
था। अगर दाँव देना होता, तो मैं कब का भाग खड़ा होता; लेकिन पदाने
में कुछ और ही बात होती है। खैर, दाँव पूरा हुआ। अगर मैं चाहता, तो
धाँधली करके दस-पाँच मिनट और पदा सकता था, इसकी काफी गुंजाइश थी,
लेकिन अब इसका मौका न था। मैं सीधे नाले की तरफ दौड़ा। विमान जल-तट
पर पहुँच चुका था। मैंने दूर से देखा, मल्लाह किश्ती लिये आ रहा है।
दौड़ा, लेकिन आदमियों को भीड़ में दौड़ना कठिन था। आख़िर जब मैं
भीड़ हटाता, प्राणपण से आगे बढ़ता घाट पर पहुँचा, तो निषाद अपनी
नौका खोल चुका था। रामचन्द्र पर मेरी कितनी श्रद्धा थी। मैं अपने
पाठ की चिन्ता न करके उन्हें पढ़ा दिया करता था, जिसमें वह फेल न हो
जायँ। मुझमे उम्र ज्यादा होने पर भी वह नीची कक्षा में पढ़ते थे,
लेकिन वही रामचन्द्र नौका पर बैठे इस तरह मुँह फेरे चले जाते थे,
मानों मुझसे जान-पहचान ही नहीं। नकल में भी असल की कुछ-न-कुछ बू आ
ही जाती है। भक्तों पर जिनकी निगाह सदा ही तीखी रही है, वह मुझे
क्या उबारते?
시작을 누르고 줄을 정확히 입력하세요.
시작 안 됨