Boek · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 166 van 251
Auteur: प्रेमचंद
Tijd0:00
Snelheid (WPM)0.0
Nauwkeurigheid100.0%
Druk op start en typ de regels precies na. · Backspace uitgeschakeld — ga door, ook na een fout.
मेरे हमनोलियों में एक लड़का गया नाम का था। मुझसे दो-तीन साल बड़ा
होगा। दुबला, लाँबा, बन्दरों ही की-सी लम्बी-लम्बी, पतली-पतली
उंगलियाँ, बन्दरों ही की-सी चपलता, वही झल्लाहट। गुल्ली कैसी ही हो,
उस पर इस तरह लपकता था, जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है। मालूम नहीं
उसके माँ-बाप थे या नहीं, कहाँ रहता था, क्या खाता था; पर था हमारे
गुल्ली क्लब का चैम्पियन। जिसकी तरफ वह आ जाय उसकी जीत निश्चित थी।
हम सब उसे दूर से आते देख, उसका दौड़कर स्वागत करते थे और उसे अपना
गोइयाँ बना देते थे।
एक दिन हम और गया दो ही खेल रहे थे। वह पदा रहा था, मैं पद रहा था;
मगर कुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते हैं,
पदना एक मिनिट का भी अखरता है। मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें
चलीं, जो ऐसे अवसर पर शास्त्र-विहित न होने पर भी क्षम्य हैं; लेकिन
गया अपना दाँव लिये बगैर मेरा पिण्ड न छोड़ता था।
मैं घर की ओर भागा। अनुभय-विनय का कोई असर न हुआ।
गया ने मुझे दौड़कर पकड़ लिया और डंडा तानकर बोला-मेरा दाँव देकर
जाओ। पदाया तो बड़े बहादुर बनके, पदने के बेर क्यों भागे जाते हो?
'तुम दिन भर पदाऔ तो मैं दिन-भर पदता रहूँ!'
Druk op start en typ de regels precies na.
Niet gestart