Boek · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 151 van 251
Auteur: प्रेमचंद
Tijd0:00
Snelheid (WPM)0.0
Nauwkeurigheid100.0%
Druk op start en typ de regels precies na. · Backspace uitgeschakeld — ga door, ook na een fout.
लाभ। मदरसे के बाहर रहकर उसे स्वच्छ वायु तो मिलती, प्राकृतिक अनुभव
तो होते। पाठशाला में बन्द करके तो आप उसके मानसिक और शारीरिक दोनो
विधानो की जड़ काट देते हैं; इसलिए जब प्रांतीय व्यवस्थापिका सभा
में अनिवार्य शिक्षा का प्रस्ताव पेश हुआ, तो मेरी प्रेरणा से
मिनिस्टर साहब ने उसका विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि प्रस्ताव
अस्वीकृत हो गया। फिर क्या था। मिनिस्टर साहब की और मेरी वह ले-दे
शुरू हुई कि कुछ न पूछिए। व्यक्तिगत आक्षेप किये जाने लगे। मै गरीब
की बीबी था, मुझे ही सबकी भाभी बनना पड़ा। मुझे देश-द्रोही, उन्नति
का शत्रु और नौकरशाही का गुलाम कहा गया। मेरे कालेज में जरा-सी भी
कोई बात होती तो कौंसिल में मुझ पर वर्षा होने लगती। मैने एक चपरासी
को पृथक् किया। सारी कौंसिल पंजे झाड़कर मेरे पीछे पड़ गयी। आखिर
मिनिस्टर को मजबूर होकर उस चपरासी को बहाल करना पड़ा। यह अपमान मेरे
लिए असह्य था। शायद कोई भी इसे सहन न कर सकता। मिनिस्टर साहब से
मुझे शिकायत नहीं। वह मजबूर थे। हॉ, इस वातावरण में काम करना मेरे
लिए दुस्साध्य हो गया। मुझे अपने कालेज के आंतरिक संगठन का भी
अधिकार नहीं। अमुक क्यों नहीं परीक्षा में भेजा गया, अमुक के बदले
अमुक को क्यों नहीं छात्रवृत्ति दी गयी, अमुक अध्यापक को अमुक कक्षा
क्यों नहीं दी जाती, इस तरह के सारहीन आक्षेपो ने मेरी नाक में दम
कर दिया था। इस नयी चोट ने कमर तोड़ दी। मैंने इस्तीफा दे दिया।
Druk op start en typ de regels precies na.
Niet gestart