Boek · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 88 van 251
Auteur: प्रेमचंद
Tijd0:00
Snelheid (WPM)0.0
Nauwkeurigheid100.0%
Druk op start en typ de regels precies na. · Backspace uitgeschakeld — ga door, ook na een fout.
शाम हो गयी। खँडहर में चमगादड़ों ने चीख़ना शुरू किया। अजा-बीलें
आ-आकर अपने-अपने घोसलों में चिमटीं। पर दोनों खिलाड़ी हटे हुए थे,
मानों दो खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हों। तीन बाजियाँ
लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाजी का रंग भी अच्छा न था। वह बार-बार
जीतने का दृढ़ निश्चय कर सँभलकर खेलते थे; लेकिन एक-न-एक चाल ऐसी
बेढब आ पड़ती थी, जिससे बाज़ी खराब हो जाती था। हर बार हार के साथ
प्रतिकार की भावना और भी उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग
के ग़ज़लें गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानों कोई गुप्त धन'पा गये
हों। मिर्जाजी सुन-सुनकर झुँझलाते और हार की झेंप मिटाने के लिए
उनकी दाद देते थे। पर ज्यों-ज्यों बाज़ी कमजोर बढ़ती थी, धैर्य-हाथ
से निकलता जाता था। यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुँझलाने लगे--जनाब,
आप चाल न बदला कीजिए। यह क्या कि एक चाल चले और फिर उसे बदल दिया।
जो कुछ चलना हो एक बार चल दीजिए। यह आप मुहरे पर ही क्यों हाथ रखे
रहते हैं। मुहरे को छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहरा छुइए
ही नहीं। आप एक-एक चाल आध-आध घण्टे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं
जिसे एक चाल चलने में पांच मिनट से ज्यादा लगे, उसकी मात समझी जाय।
फिर आपने चाल बदली!
Druk op start en typ de regels precies na.
Niet gestart