Ksiazka · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Strona 156 z 251
Autor: प्रेमचंद
Czas0:00
Predkosc (WPM)0.0
Dokladnosc100.0%
Nacisnij start i wpisz linie dokladnie. · Backspace wylaczony — pisz dalej nawet po bledzie.
मैंने जवाब दिया -- भाई, उनका दोष नहीं। संभव है, इस दशा में मैं भी
वही करता, जो उन्होंने किया। मुझे अपनी स्वार्थलिप्सा की सजा मिल
गयी, और उसके लिए मैं उनका ऋणी हूँ। बनावट नहीं, सत्य कहता हूँ कि
यहाँ मुझे जो शांति है, वह और कहीं न थी। इस एकान्त जीवन में मुझे
जीवन के तत्वों का वह ज्ञान हुआ, जो संपत्ति और अधिकार की दौड़ में
किसी तरह संभव न था। इतिहास और भूगोल के पोथे चाटकर और यूरोप के
विद्यालयों की शरण जाकर भी मैं अपनी ममता को न मिटा सका; बल्कि यह
रोग दिन-दिन और भी असाध्य होता जाता था। आप सीढ़ियों पर पाँव रखे
बगैर छत की ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकते। सम्पत्ति की अट्टालिका तक
पहुँचने में दूसरों की जिन्दगी ही जीनों का काम देती है। आप उन्हें
कुचलकर ही लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। वहाँ
सौजन्य और सहानुभूति का स्थान ही नहीं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि
उस वक्त मैं हिंस्र जन्तुओं से घिरा हुआ था और मेरी सारी शक्तियाँ
अपनी आत्मरक्षा में ही लगी रहती थीं। यहाँ मैं अपने चारों ओर सन्तोष
और सरलता देखता हूँ। मेरे पास जो लोग आते हैं, कोई स्वार्थ लेकर
नहीं आते और न मेरी सेवाओं में प्रशंसा या गौरव की लालसा है।
Nacisnij start i wpisz linie dokladnie.
Nie rozpoczeto