Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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शंकर ने साल भर तक कठिन तपस्या की। मीयाद के पहले रूपया अदा करने का
उसने ब्रत-सा कर लिया। दोपहर को पहले भी चूल्हा न जलता था, चबेने पर
बसर होती थीं, अब वह भी बन्द हुआ, केवल लङके के लिए रात को रोटियाँ
रख दी जाती। पैसे रोज का तंबाकू पी जाता था, यही एक ब्यसन था जिसका
वह कभी त्याग न कर सका था। अब वह व्यसन भी इस कठिन ब्रत के भेंट हो
गया। उसने चिलम पटक दी, हुक्का तोङ दिया और तम्बाकू की हाँङी
चूर-चूर कर डाली। कपडे पहले भी त्याग की चरम सीमा तक पहुँच चुके थे,
अब वह प्रकृति की न्यूनतम रेखाओं में आबध्द हो गये। शिशिर की
अस्थि-बेघक शीत को उसने आग तापकर काट दिया। इस ध्रुव-संकल्प का फल
आशा से बढकर निकला। साल के अन्त में उसके पास ६०) जमा हो गये। उसने
समझा, पंडितजी को इतने रुपये दे दूँगा और कहूँगा, महाराज, बाकी
रूपये भी जल्द ही आपके सामने हाजिर करूगा। १५) की तो और बात है,
क्या पंडित जी इतना भी न मानेगे? उसने रुपये लिये और ले जाकर
पंडित जी के चरण-कमलो पर अर्पण कर दिये। पंडितजी ने विसि्मत होकर
पूछा -- किसी से उधार लिये क्या?
शंकर-- नहीं महाराज, आपके असीस से अबकी मजूरी अच्छी मिली।
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