Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 232 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocidade (WPM)0.0
Precisao100.0%
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente. · Backspace desativado — continue mesmo apos erro.
भगत-कहा जाता है कि विदेशी चीजों का व्यवहार मत करो। यह गरीबों के
साथ घोर अन्याय है। हमें बाजार में जो चीज सस्ती और अच्छी मिले, वह
लेनी चाहिए। चाहे स्वदेशी हो या विदेशी। हमारा पैसा सेंत में नहीं
आता कि उसे रद्दी-भद्दी स्वदेशी चीजों पर फेंकें।
एक शंका-पैसा अपने देश में तो रहता है, दूसरों के हाथ में तो नहीं
जाता?
दूसरी शंका-अपने घर में अच्छा खाना न मिले तो क्या विजातियों के घर
अच्छा भोजन करने लगेंगे? भगत--लोग कहते हैं कि लड़कों को सरकारी
मदरसों में मत भेजो--सरकारी मदरसों में न पढ़ते तो आज हमारे भाई
बड़ी-बड़ी नौकरियाँ कैसे पाते, बड़े-बड़े कारखाने कैसे चलाते, बिना
नयी विद्या पढ़े अन्न संसार में निर्वाह नहीं हो सकता, पुरानी
विद्या पढ़कर पत्रा देखने और कथा बाँचने के सिवा और क्या आता है?
राज-काज क्या यही पोथी बाँचने-वाले लोग करेंगे?
एक शंका--हमें राज-काज न चाहिए, हम अपनी खेती-बारी ही में मगन हैं,
किसी के गुलाम तो नहीं?
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente.
Nao iniciado