Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो
सेवैयाँ खायेंगे। वह क्या जाने कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी
कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी आज आँखें
बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाय। उनकी अपनी जेबों में तो
कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते
हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस बारह!
उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, पाठ, नौ,
पन्द्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें
लायेंगे-खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या। और सबसे
ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पांच साल का गरीब-सूरत, दुबला-पतला
लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे को भेंट हो गया और मां न जाने क्यों
पीली होती-होती एक दिन मर गयी। किसी को पता न चला, क्या बीमारी है।
कहती भी तो कौन सुननेवाला था। दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल ही
में सहती थी और जब न सहा गया तो संसार से विदा हो गयी। अब हामिद
अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है।
उसके अब्बाजान रुपये कमाने गये हैं। बहत-सी थैलियाँ लेकर आयेंगे।
अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें
लाने गयी हैं। इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज है और फिर
बच्चों की आशा!
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