Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 40 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocidade (WPM)0.0
Precisao100.0%
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente. · Backspace desativado — continue mesmo apos erro.
बाजे की आवाज कानो में आयी। बीरबलसिंह ने बाहर जाकर पूछा। मालूम
हुआ, स्वराज्यवालों का जुलूस पा रहा है। चटपट वर्दी पहनी, साफा
बाँधा और जेब में पिस्तौल रखकर बाहर आये। एक क्षण में घोड़ा तैयार
हो गया। कांस्टेबल पहले ही से तैयार बैठे थे। सब लोग डबल मार्च करते
हुए जुलूस की तरफ चले।
( ४ )
लोग डबल मार्च करते हुए कोई पन्द्रह मिनट में जुलूस के सामने पहुँच
गये। इन लोगों को देखते ही अगणित कंठों से 'वन्देमातरम्' की एक
ध्वनि निकली, मानो मेघमण्डल में गर्जन का शब्द हुआ हो, फिर सन्नाटा
छा गया। उस जुलूस में और इस जुलूस में कितना अन्तर था! वह स्वराज्य
के उत्सव का जुलूस था, यह एक शहीद के मातम का। तीन दिन के भीषण ज्वर
और वेदना के बाद आज उस जीवन का अन्त हो गया, जिसने कभी पद की लालसा
नहीं की, कभी अधिकार के सामने सिर नहीं झुकाया। उन्होंने मरते समय
वसीयत की थी कि मेरी लाश को गंगा में नहलाकर दफन किया जाय और मेरे
मजार पर स्वराज्य का झंडा खड़ा किया जाय। उनके मरने का समाचार फैलते
ही सारे शहर पर मातम का पर्दा-सा पड़ गया। जो सुनता था, एक बार इस
तरह चौंक पड़ता था, जैसे उसे गोली लग गयी हो और तुरन्त उनके दर्शनों
के लिए भागता था। सारे बाजार बन्द हो गये, इक्कों और ताँगों का कहीं
पता न था, जैसे शहर लुट गया हो। देखते-देखते सारा शहर उमड़ पड़ा।
जिस वक्त जनाजा उठा, लाख-सवा लाख आदमी साथ थे। कोई आँख ऐसी न थी, जो
आँसुओं से लाल न हो।
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente.
Nao iniciado