Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Pagina 72 de 251
Autor: प्रेमचंद
Tempo0:00
Velocidade (WPM)0.0
Precisao100.0%
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente. · Backspace desativado — continue mesmo apos erro.
दोनों के पास मौरूसो जागीरें थी, जीविका की, कोई चिन्ता न थी; घर
में बैठे चखौतियाँ करते थे। आखिर और करते ही क्या!
प्रातःकाल दोनों मित्र नाश्ता करके बिसात बिछाकर बैठ जाते, मुहरे सज
जाते, और लड़ाई के दाव-पेंच होने लगते। फिर खबर न होती थी कि कब
दोपहर हुई, कब तीसरा पहर, कब शाम। घर के भीतर से बार-बार बुलावा
आता-खाना तैयार है। यहाँ से जवाब मिलता--चलो, आते हैं; दस्तरख्वान
बिछाओ। यहाँ तक कि बावरची विवश होकर कमरे ही में खाना रख जाता था,
और दोनों मित्र दोनों काम साथ-साथ करते थे। मिर्जा सजादअली के घर
में कोई बड़ा-बूढ़ा न था, इसलिए उन्हीं के दीवानखाने में बाजियाँ
होती थीं; मगर यह बात न थी, कि मिर्जा के घर के और लोग उनके इस
व्यवहार से खुश हों। घरवालों का तो कहना ही क्या, महल्लेवाले, घर के
नौकर-चाकर तक नित्य द्वेष-पूर्ण टिप्पणियाँ किया करते थे-बड़ा मनहूस
खेल है। घर को तबाह कर देता है। खुदा न करे, किसी को इसकी चाट पड़े।
आदमी दीन-दुनियाँ किसी के काम का नहीं रहता, न घर का न घाट का। बुरा
रोग है। यहाँ तक कि मिर्जा की बेगम साहबा को इससे इतना द्वेष था कि
अवसर खोज-खोजकर पति को लताड़ती थी। पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से
मिलता था। वह सोती ही रहती थीं, तब तक उधर बाजी बिछ जाती थी। और रात
को जब सो जाती थीं, तब कहीं मिर्जाजी भीतर आते थे। हाँ नौकरों पर वह
अपना गुस्सा उतारती रहती थीं-क्या पान माँगे हैं?
Pressione iniciar e digite as linhas exatamente.
Nao iniciado