Языки

Клавиатура

Страница 41 из 251

Автор: प्रेमचंद

Время0:00
Скорость (WPM)0.0
Точность100.0%

Нажмите старт и печатайте строки точно. · Backspace отключен — продолжайте даже после ошибки.

बीरबलसिह अपने कांस्टेबलों और सवारों को पाँच-पाँच गज के फासले पर
जुलूस के साथ चलने का हुक्म देकर खुद पीछे चले गये। पिछली सफों मे
कोई पचास गज तक महिलाएँ थीं। दारोगा ने उनकी तरफ ताका। पहली ही कतार
में मिट्ठन बाई नजर आयी। बीरबल को विश्वास न आया। फिर ध्यान से
देखा, वही थीं। मिट्टन ने उनकी तरफ एक बार देखा और आँखें फेर ली; पर
उनकी एक चितवन में कुछ ऐसा धिक्कार, कुछ ऐसी लज्जा, कुछ ऐसी व्यथा,
कुछ ऐसी घृणा भरी हुई थी कि बीरबल सिह की देह में सिर से पाँव तक
सनसनी-सी दौड़ गयी। वह अपनी दृष्टि में कभी इतने हल्के, इतने
दुर्बल, इतने जलील न हुए थे।
सहसा एक युवती ने दारोगाजी की तरफ देखकर कहा-कोतवाल साहब, कहीं हम
लोगों पर डण्डे न चला दीजिएगा! आपको देखकर भय हो रहा है।
दूसरी बोली-आप ही के कोई भाई तो थे, जिन्होंने उस दिन माल के
चौरस्ते पर इस वीर पुरुष पर आघात किये थे!
मिट्ठन ने कहा-आपके कोई भाई न थे, आप खुद थे।
बीमियों के मुँहों से आवाजें निकलीं-अच्छा, यह वही महाशय हैं?
महाशय, आपको नमस्कार है! यह आप ही की कृपा का फल है कि आज हम भी
आपके डण्डे के दर्शनों के लिए आ खड़ी हुई हैं!

Нажмите старт и печатайте строки точно.

Не начат