Diller

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Sayfa 16 / 251

Yazar: प्रेमचंद

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मिठाइयो के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की हैं, कुछ गिलट और कुछ
नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वह सब आगे बढ़
जाते हैं। हामिद लोहे की दूकान पर रुक जाता हैं। कई चिमटे रखे हुए
थे। उसे खयाल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ
उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है; अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे
दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर
में एक काम की चीज हो जायगी। खिलौने से क्या फायदा। व्यर्थ में पैसे
खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई
आँख उठाकर नहीं देखता। या तो घर पहुँचते-पहुंँचते टूट-फूट बराबर हो
जायँगे। चिमटा कितने काम को चीज है। रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हे
में सेंक लो। कोई आग माँगने आये तो चटपट चूल्हे से भाग निकालकर उसे
दे दो। अम्माँ बेचारी को कहाँ फुरसत है कि बाजार आयें, और इतने पैसे
ही कहाँ मिलते हैं। रोज हाथ जला लेती हैं। हामिद के साथी आगे बढ़
गये हैं। सबील पर सब-के-सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची
हैं!

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