Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 182 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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गाड़ी आयी, हम दोनों सवार हुए। खानसामों ने ईश्वरी को सलाम किया।
मेरी ओर देखा भी नहीं।
ईश्वरी ने कहा-कितने तमीजदार हैं ये सब! एक हमारे नौकर हैं कि कोई
काम करने का ढङ्ग नहीं।
मैंने खट्टे मन से कहा-इसी तरह अगर तुम अपने नौकरों की भी आठ आने
रोज इनाम दिया करो तो शायद इससे ज्यादा तमीजदार हो जायें।
तो क्या तुम समझते हो, यह सब केवल इनाम के लालच से इतना अदब करते
हैं? 'जी नहीं, कदापि नहीं। तमीज और अदब तो इनके रक्त में मिल गया
है।'
गाड़ी चली। डाक थी। प्रयाग से चली तो प्रतापगढ़ जाकर रुकी। एक आदमी
ने हमारा कमरा खोला। मैं तुरन्त चिल्ला उठा-दूसरा दरजा है-सेकण्ड
क्लास है।
उस मुसाफिर ने डब्बे के अन्दर आकर मेरी ओर एक विचित्र उपेक्षा को
दृष्टि देखकर कहा-जी हाँ, सेवक भी इतना समझता है, और बीचवाले बर्थ
पर बैठ गया। मुझे कितनी लज्जा आयी, कह नहीं सकता।
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