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Yazar: प्रेमचंद

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74158 प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ 1950 प्रेमचंद
शतरंज के खिलाड़ी वाजिदअलीशाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में
डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, सभी विलासिता में डूबे हुए थे।
कोई नृत्य और गान की मजलिस सजोता था, तो कोई अफीम की पीनक ही के मजे
लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था।
शासन-विभाग में, साहित्य-क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में,
कला-कौशल में, उद्योग-धन्धों में, आहार-व्यवहार में, सर्वत्र
विलासिता, व्याप्त-हो रही थी। राजकर्मचारी विषय-वासना में, कविगण
प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कल बत्तू और चिकन बनाने में,
व्यवसायी सुरमे, इत्र, मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में लिप्त थे।
सभी की आँखों में विलासिता का मद छाया हुआ था। संसार में क्या हो
रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे हैं। तीतरों की लड़ाई
के लिए पाल बदी जा रही है। कहीं चौसर बिछी हुई है; पौ बारह का शोर
मचा हुआ है। कहीं शतरंज का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। राजा से लेकर
रंक तक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरों को पैसे मिलते तो वे
रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते। शतरंज, ताश, गजीफा खेलने से
बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है। पेचीदा मसलों
को सुलझाने की आदत पड़ती है, ये दलीलें जोर के साथ पेश की जाती थी
(इस संप्रदाय के लोगों से दुनिया अब भी खाली नहीं है)। इसलिए अगर
मिर्जा सज्जादअली और मीर रौशनअली अपना अधिकांश समय बुद्धि तीव्र
करने में व्यतीत करते थे, तो किसी विचारशील पुरुष को क्या आपत्ति हो
सकती थी?

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