Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 98 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले
ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली,
हवा के बह हलके हलके झोंके, फुटबाल की वह उछल-कूद, कबड्डी के वह
दाँव-घात, वालीबाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिवार्य रूप
से खींच ले जाती और वहाँ जाते ही मै सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा
टाइम-टेबिल, वह आँखफोड़ पुस्तकें किसी की याद न रहती, और फिर भाई
साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मै उनके साये से भागता,
उनकी आँखों से दूर रहने की चेष्टा करता, कमरे में इस तरह दबे पाँव
आता कि उन्हे खबर न हो! उनकी नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले।
हमेशा सिर पर एक नगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और
विपत्ति के बीच में भी आदमी मोह और माया के बन्धम मे जकड़ा रहता है,
मै फटकार और घुड़कियाँ खाकर भी खेल-कूद का तिरस्कार न कर सकता।
( २ )
सालाना इम्तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गये मै पास हो गया और दरजे में
प्रथम आया। मेरे और उनके बीच में केवल दो साल का अन्तर रह गया। जी
में आया, भाई साहब को आड़े हाथों आपकी वह घोर तपस्या कहाँ गयी?
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