Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 117 / 251
Yazar: प्रेमचंद
Süre0:00
Hız (WPM)0.0
Doğruluk100.0%
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla. · Backspace devre dışı — yanlış yazsan da devam et.
मैंने संतोष का भाव दिखाकर कहा-पाँच लाख कुछ कम नहीं होते जी।
विक्रम इतना संतषी न था। बोला-पांच लाख क्या, हमारे लिए तो इस वक्त
पाँच सौ भी बहुत हैं भाई, मगर जिन्दगी का प्रोग्राम तो बदलना पड़
गया। मेरी यात्रावाली स्कीम तो टल नहीं सकती। हाँ, पुस्तकालय गायब
हो गया।
मैंने आपत्ति की - आखिर यात्रा में तुम दो लाख से ज्यादा तो न खर्च
करोगे?
'जी नहीं, उसका बजट है साढ़े तीन लाख का। सात वर्ष का प्रोग्राम है।
पचास हजार रुपये साल ही तो हुए
'चार हजार महीना कहो। मैं समझता हूँ, दो हजार में तुम बड़े आराम से
रह सकते हो।
विक्रम ने गर्म होकर कहा-मैं शान से रहना चाहता हूँ। भिखारियों की
तरह नहीं।
१० 'दो हजार में भी तुम शान से रह सकते हो।'
'जब तक आप अपने हिस्से में से दो लाख मुझे न देंगे, पुस्तकालय न बन
सकेगा।'
'कोई जरूरी नहीं कि तुम्हारा पुस्तकालय शहर में बेजोड़ हो।'
'मैं तो बेजोड़ ही बनवाऊँगा।'
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla.
Başlatılmadı