Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 135 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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'कैसे कहते हो चोट नहीं लगी? सारा हाथ और सिर सूज गया है। कपड़े खून
से तर। यह मुआमला क्या है? कोई मोटर-दुर्घटना तो नहीं हो गयी
'बहुत मामूली चोट है साहब, दो-चार दिन में अच्छी हो जायगी। 'घबराने
की कोई बात नहीं।'
प्रकाश के मुख पर आशापूर्ण, 'शान्त मुस्कान थी। क्रोध, लज्जा वा
प्रतिशोध की भावना का नाम भी न था।
बड़े ठाकुर ने और व्यग्र होकर पूछा-लेकिन हुश्रा क्या, यह क्यों
नहीं बतलाते? किसी से मार-पीट हुई हो, तो थाने में रपट करवा दूंँ।
प्रकाश ने हलके मन से कहा -मार-पीट किसी से नहीं हुई साहब!
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