Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 201 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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महादेव दिन-भर का भूखा-प्यासा, थका माँदा रह-रहकर झपकियाँ ले लेता
था; किन्तु एक क्षण में फिर चौंककर आँखें खोल देता, और उस विस्तृत
अंधकार में उसकी आवाज सुनायी देती-'सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता। आधी
रात गुजर गयी थी। सहसा वह कोई आहट पाकर चौंका। देखा, एक दूसरे वृक्ष
के नीचे एक धुंधला दीपक जल रहा है, और कई आदमी बैठे हुए आपस में कुछ
बातें कर रहे हैं। वे सब चिलम पी रहे थे। तमाखू की महक ने उसे अधीर
कर दिया। उच्च स्वर से बोला-'सत गुरुदत्त शिवदत्त दाता', और उन
आदमियों की ओर चिलम पीने चला; किन्तु जिस प्रकार बन्दूक की आवाज
सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसी प्रकार उसे आते देख वे सब-के-सब
उठकर भागे। कोई इधर गया, कोई उधर। महादेव चिल्लाने लगा-'ठहरो-ठहरो!'
एकाएक उसे ध्यान आ गया ये सब चोर हैं। वह जोर से चिल्ला
उठा-'चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो!' चोरों ने पीछे फिरकर भी न देखा।
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