Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 221 / 251
Yazar: प्रेमचंद
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कर सका, तो अब और कौन-सा उपाय है जिसके द्वारा इसके दूने रुपये जमा
हों। जब सिर पर ऋण का बोझ ही लदना है तो क्या मन-भर का और क्या सवा
मन का। उसका उत्साह क्षीण हो गया, मिहनत से घृणा हो गयी। आशा उत्साह
की जननी है, आशा में तेज है, बल है, जीवन है। आशा ही संसार की
संचालक शक्ति है। शंकर आशाहीन होकर उदासीन हो गया। वह जरूरतें,
जिनको उसने साल भर तक टाल रखा था, अब द्वार पर खड़ी होनेवालो
भिखारिणी न थीं, बल्कि छाती पर सवार होनेवाली पिशाचिनियाँ थीं, जो
अपनी भेंट लिये बिना जान नहीं छोड़तीं। कपड़ों में चकत्तियों के
लगने की भी एक सीमा होती है। अब शंकर को चिट्ठा मिलता तो वह रुपये
जमा न करता, कभी कपड़े लाता, कभी खाने की कोई वस्तु। जहाँ पहले
तमाखू ही पिया करता था, वहाँ अब गाँजे और चरस का चस्का भी लगा। उसे
अब रुपये अदा करने की कोई चिन्ता न थी मानों उसके उपर किसी का एक
पैसा भी नहीं आता। पहले जूड़ी चढ़ी होती थी, पर वह काम करने अवश्य
जाता था, अब काम पर न जाने के लिए बहाना खोजा करता।
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