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Sayfa 26 / 251

Yazar: प्रेमचंद

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अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल
गया; लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने
पैरों चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आयी, उसमें कुछ लाल रंग के
फटे-पुराने चिथड़े बिछाये गये, जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटें।
नूरे ने यह टोकरी उठायी और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके
दोनों छोटे भाई सिपाही की तरफ से 'छोनेवाले, जागते लहो' पुकारते
हैं। मगर रात तो अँधेरी होनी ही चाहिए; महमूद को ठोकर लग जाती है।
टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बन्दूक
लिये जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है।
महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिल
गया है, जिससे वह टूटी टाँग को आनन-फानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का
दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जोड़ दी जाती है, लेकिन सिपाही
को ज्यों ही खड़ा किया जाता है, टाँग जवाब दे देती है। शल्यक्रिया
असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक
जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टाँग से तो न चल सकता था, न बैठ
सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा
पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार
साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपान्तर चाहो, कर सकते हो।
कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है। अब मियाँ हामिद का हाल
सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार
करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।

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