Diller

Klavye

Sayfa 32 / 251

Yazar: प्रेमचंद

Süre0:00
Hız (WPM)0.0
Doğruluk100.0%

Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla. · Backspace devre dışı — yanlış yazsan da devam et.

बीरबल ग्रेजुएट था। उसका बाप सुपरिण्टेण्डेण्ट पुलिस था। उसकी नस-नस
में रोब भरा हुआ था। अफसरों की दृष्टि में उसका बड़ा सम्मान था।
खासा गोरा-चिट्टा, नीली आँखों और भूरे बालोंवाला तेजस्वी पुरुष था।
शायद जिस वक्त वह कोट पहनकर ऊपर से हैट लगा लेता तो वह भूल जाता था
कि मैं भी यहीं का रहने वाला हूँ। शायद वह अपने को राज्य करनेवाली
जाति का अंग समझने लगता था; मगर इब्राहिम के शब्द में जो तिरस्कार
भरा हुआ था, उसने जरा देर के लिए उसे लज्जित कर दिया; पर मुआमला
नाजुक था। जुलूस को रास्ता दे देता है, तो जवाब तलब हो जायगा; वहीं
खड़ा रहने देता है, तो यह सब न जाने कब तक खड़े रहें; इस संकट में
पड़ा हुआ था कि उसने डी० एस० पी० को घोड़े पर आते देखा। अब
सोच-विचार का समय न था। यही मौका था कारगुजारी दिखाने का। उसने कमर
से बेटन निकाल लिया और घोड़े को एड़ लगाकर जुलूस पर चढ़ाने लगा। उसे
देखते ही और सवारों ने भी घोड़ों को जुलूस पर चढ़ाना शुरू कर दिया।
इब्राहिम दारोगा के घोड़े के सामने खड़ा था। उसके सिर पर एक बेटन
ऐसे जोर से पड़ा कि उसकी आखें तिलमिला गईं। खड़ा न रह सका। सिर पकड़
कर बैठ गया। उसी वक्त दारोगाजी के घोड़े ने दोनों पाँव उठाये और
जमीन पर बैठा हुआ इब्राहिम उसके टापों के नीचे आ गया। जुलूस अभी तक
शान्त खड़ा था। इब्राहिम को गिरते देखकर कई आदमी उसे उठाने के लिए
लपके; मगर कोई आगे न बढ़ सका। उधर सवारों के डण्डे बड़ी निर्दयता से
पड़ रहे थे। लोग हाथों पर डण्डों को रोकते थे और अविचलित रूप से
खड़े थे। हिंसा के भावों में प्रवाहित न हो जाना उनके लिए प्रतिक्षण
कठिन होता जाता था। जब आघात और अपमान ही सहना है, तो फिर हम भी इस
दीवार को पार करने की क्यों न चेष्टा करें?

Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla.

Başlatılmadı