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Yazar: प्रेमचंद

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झूरी काछी के दोनो बैलो के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाई जाति के
थे। देखने में सुन्दर, काम में चौकस, डील ऊँचे। बहुत दिनों साथ
रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास
बैठे हुए दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक दूसरे के
मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई
ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करनेवाला
मनुष्य वंचित है। दोनों एक दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम
प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे। विग्रह के
भाव से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से जैसे
दोस्तों में घनिष्टता होते ही धौल-घप्पा होने लगता है। इसके बिना
दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हलकी-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास
नहीं किया जा सकता। जिस वक्त यह दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिये
जाते और गरदने हिला-हिलाकर चलते, तो हरएक की यही चेष्टा होती थी कि
ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गरदन पर रहे। दिन-भर के बाद दोपहर या
सन्ध्या को दोनों खुलते, तो एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा
लिया करते। नाँद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ
नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मॅुह हटा लेता तो दूसरा
भी हटा लेता था।

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