图书 · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
第204页 / 共251页
作者: प्रेमचंद
时间0:00
速度 (WPM)0.0
准确率100.0%
按开始并准确输入每行文字。 · 退格键已禁用 — 即使输入错误也请继续。
यह बोल महादेव की जिहा पर रहता था। दिन में सहस्रों ही बार ये शब्द
उसके मुख से निकलते थे; पर उनका धार्मिक भाव कभी उसके अंतःकरण को
स्पर्श न करता था? जैसे कि बाजे से राग निकलता है उसी प्रकार उसके
मुंँह से वह बोल निकलता था, निरर्थक और प्रभाव-शून्य। तब उसका
हृदय-रूपी-वृक्ष पत्र-पल्लव-विहीन था। यह निर्मल वायु उसे गुंजारित
न कर सकती थी। पर अब उस वृक्ष में कोपलें और शाखाएँ निकल आयो थीं;
इस वायु-प्रवाह से झूम उठा; गुंजित हो गया।
按开始并准确输入每行文字。
未开始