Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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खेल शुरू हो गया। मैंने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछली। गुल्ली डण्डा
के सामने से निकाला गयी। उसने हाथ लपकाया जैसे मछली पकड़ रहा हो।
गुल्ली उसके पीछे जाकर गिरी। यह वही गया है, जिसके हाथों में गुल्ली
जैसे आप-ही-आप जाकर बैठ जाती थी। वह दाहने-बायें कहीं हो, गुल्ली
उसकी हथेलियों में ही पहुँचती थी। जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल
देता हो। नयी गुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली,
नोकदार गुल्ली, सपाट गुल्ली, सभी उससे मिल जाती थीं। जैसे उसके
हाथों में कोई चुम्बक हो, जो गुल्लियों को खींच लेता हो, लेकिन आज
गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा। फिर तो मैने पदाना शुरू किया।
मैं तरह-तरह की धाँधलियाँ कर रहा था। अभ्यास की कसर बेईमानी से पूरी
कर रहा था। हुच जाने पर डण्डा खेले जाता था, हालाँकि शास्त्र के
अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी। गुल्ली पर ओछी चोट पड़ती और वह
जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता और दोबारा
टाँड़ लगाता। गया ये सारी बे-कायदगियाँ देख रहा था; पर कुछ न बोलता
था, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गये। उसका निशाना कितना अचूक
था। गुल्ली उसके हाथ से निकलकर टन-से डण्डे में जाकर लगती थी। उसके
हाथ से छुटकर उसका काम था डण्डे से टकरा जाना; लेकिन आज वह गुल्ली
डण्डे में लगती ही नहीं। कभी दाहिने जाती है, कभी बायें, कभी आगे,
कभी पीछे।
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