Book · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Author: प्रेमचंद
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आध घण्टे पदाने के बाद एक बार गुल्ली डण्डे में आ लगी। मैंने धाँधली
की, गुल्ली डण्डे में नहीं लगी, बिलकुल पास से गयी; लेकिन लगी नहीं।
गया ने किसी प्रकार का असन्तोष प्रकट न किया।
'न लगी होगी।'
'डण्डे में लगती तो क्या मैं बेईमानी करता?'
'नहीं भैया, तुम बेईमानी करोगे!'
'बचपन में मजाल था, कि मैं ऐसा घपला करके जीता बचता। यही गया गरदन
पर चढ़ बैठता; लेकिन आज मैं उसे कितनी आसानी से धोखा दिये चला जाता
था। गधा है! सारी बातें भूल गया।
सहसा गुल्ली फिर डण्डे में लगी और इतने जोर से लगी जैसे बंदूक छूटी
हो। इस प्रमाण के सामने अब किसी तरह की धाँधली करने का साहस मुझे इस
वक्त भी न हो सका, लेकिन क्यों न एक बार सच को झूठ बताने की चेष्टा
करूँ? मेरा हरज ही क्या है। मान गया, तो वाह-वाह, नहीं तो दो-चार
हाथ पदना ही तो पड़ेगा। अँधेरे का बहाना करके जल्दी से गला छूड़ा
लूँगा। फिर कौन दाँव देने आता है!
गया ने विजय के उल्लास से कहा-लग गयी, लग गयी! टन-से बोली!
मैंने अनजान बनने की चेष्टा करके कहा-तुमने लगते देखा? मैंने तो
नहीं देखा।
'टन से बोली है सरकार!'
'और जो किसी ईट में लग गयी हो!
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