Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 185 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
Temps0:00
Vitesse (WPM)0.0
Précision100.0%
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes. · Retour arriere desactive — continuez meme apres une erreur.
मैं शहसवार नहीं हूँ। हॉ लड़कपन में कई बार लद्दू घोड़ों पर सवार
हुआ हूँ। यहाँ देखा तो दो कलाँ रास घोड़े हमारे लिए तैयार खड़े थे।
मेरी तो जान ही निकल गयी। सवार तो हुआ पर बोटियाँ काँप रही थीं।
मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया। घोड़े को ईश्वरी के पीछे डाल
दिया। खैरियत तो यह हुई कि ईश्वरी ने घोड़े को तेज न किया, वरना
शायद मैं हाथ-पॉव तुड़वाकर लौटता। संभव है, ईश्वरी ने समझ लिया हो
कि यह कितने पानी में है।
( ३ )
ईश्वरी का घर क्या था, किला था। इमामबाड़े का-सा फाटक, द्वार पर
पहरेदार टहलता हुआ, नौकरों का कोई हिसाब नहीं; एक हाथी
बँधा हुआ। ईश्वरी ने अपने पिता, चाचा, ताऊ आदि सबसे मेरा परिचय
कराया, और उसी अतिशयोक्ति के साथ। ऐसी हवा बाँधी कि कुछ न पूछिए।
नौकर-चाकर हो नहीं, घर के लोग भी मेरा सम्मान करने लगे। देहात के
जमींदार, लाखों का मुनाफा, मगर पुलिस कांस्टेबिल को भी अफसर
समझनेवाले। कई महाशय तो मुझे हुजूर-हुजूर कहने लगे।
जब जरा एकान्त हुआ, तो मैंने ईश्वरी से कहा--तुम बड़े शैतान हो यार,
मेरी मिट्टी क्यों पलीद कर रहे हो?
Clique sur démarrer puis tape exactement les lignes.
Non démarré