Livre · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Page 186 sur 251
Auteur: प्रेमचंद
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ईश्वरी ने सुदृढ़ मुस्कान के साथ कहा-इन गधों के सामने यही चाल
जरूरी थी; वरना सीधे मुँह बोलते भी नहीं।
जरा देर बाद एक नाई हमारे पाँव दाबने आया। कँवर लोग स्टेशन से आये
हैं, थक गये होंगे। ईश्वरी ने मेरी ओर इशारा करके कहा-पहले कॅुवर
साहब के पाँव दबा।
मै चारपाई पर लेटा हुआ था। मेरे जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि
किसी ने मेरे पाँव दबाये हों। मैं इसे अमीरों के चोचले, रईसों का
गधापन और बड़े आदमियों की मुटमरदी और जाने क्या-क्या कहकर ईश्वरी का
परिहास किया करता और आज मैं पौतड़ों का रईस बनने का स्वांँग भर रहा
था!
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