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Autore: प्रेमचंद

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मिर्जा--अज़ी जाइए भी, ग़ाज़ीउद्दीन हैदर के यहाँ बावच का काम
करते-करते उम्र गुज़र गयी, आज रईस बनने चले हैं। रईस बनना कुछ
दिल्लगी नहीं।
मीर--क्यों अपने बुजुर्गों के मुँह में कालिख लगाते हो--वे ही
बावर्ची का काम करते होंगे। यहाँ तो हमेशा बादशाह दस्तरख्वान पर
खाना खाते चले आये हैं।
मिर्जा--अरे चल चरकटे, बहुत बढ़-चढ़कर बातें न कर!
मीर--जबान संभालिए, वर्ना बुरा होगा। मैं ऐसी बातें सुनने का आदी
नहीं हूँ; यहाँ तो किसी ने आँखें दिखायीं कि उसकी आँखें निकालीं। है
हौसला?
मिर्ज़ा--पाप मेरा हौसला देखना चाहते हैं, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ
हो जायँ, इधर या उधर।

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