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Autore: प्रेमचंद

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मीर--तो यहाँ तुमसे दबनेवाला कौन है? ‌‌‍‌दोनों दोस्तों ने कमर से
तलवारें निकाल ली। नबाबी ज़माना था; सभी तलवार, पेशक़ब्ज, कटार
वगैरह बाँधते थे। दोनों विलासी थे; पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक
भावों का अधःपतन हो गया था। बादशाहत के लिए क्यों मरें? पर
व्यक्तिगत वीरता का अभाव न था। दोनों ने पैंतरे बदले, तलवारें
चमकीं, छपाछप की आवाजें आयीं। दोनों जख्मी होकर गिरे और दोनों में
वहीं तड़प-तड़पकर जानें दीं। अपने बादशाह के लिए जिनकी आँखों से एक
बूॅद आँसू न निकला, उन्हीं ने शतरंज के वजीर की रक्षा में प्राण दे
दिये।
अँधेरा हो चला था। बाज़ी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने
सिंहासनों पर बैठे मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।
चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। खँडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी
हुई दीवारें और धूल-धूसरित मीनारें इन लाशों को देखतीं और सिर धुनती
थीं।
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