Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। भूरी इन्हें फूल की छड़ी से
भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहाँ मार पड़ी।
आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा! नाँद की तरफ
आँखें तक न उठायीं। दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता; पर इन
दोनों ने जैसे पाँव उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया;
पर दोनों ने पॉव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा के नाक में
खूब उंडे जमाये, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर
भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाटकर बराबर हो गया। गले में
बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं, तो दोनों पकड़ाई में न आते।
हीरा ने मूक भाषा में कहा-भागना व्यर्थ है।
मोती ने उसी भाषा में उत्तर दिया-तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।
अबकी बड़ी मार पड़ेगी।
'पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है, तो मार से कहाँ तक बचेंगे।'
'गया दो आदमियो के साथ दौड़ा आ रहा है। दोनों के हाथों में लाठियाँ
है।'
मोती बोला-कहो तो दिखा दूं कुछ मजा मैं भी। लाठी लेकर आ रहा है।'
हीरा ने समझाया-नहीं भाई! खड़े हो जाओ।
'मुझे मारेगा, तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगा।'
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