Libro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autore: प्रेमचंद
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'नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।
मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुँचा और दोनों को पकड़कर ले
चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मार-पीट न की, नहीं मोती भी पलट
पड़ता। उसके तेवर देखकर गया और सहायक समझ गये, कि इस वक्त टाल जाना
ही मसलहत है।
आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया। दोनों चुपचाप खड़े
रहे। घर के लोग भोजन करने लगे। उसी वक्त एक छोटी-सी लड़की दो
रोटियाँ लिये निकली, और दोनों के मुँह में देकर चली गयी। उस एक रोटी
से इनकी भूख तो क्या शान्त होती; पर दोनों के हृदय की मानो भोजन मिल
गया। यहाँ भी किसी सज्जन का वास है। लड़की भैरों की थी। उसकी माँ मर
चुकी थी। सौतेली माँ उसे मारती रहती थी; इसलिए इन बैलों से उसे एक
प्रकार की आत्मीयता हो गयी थी।
दोनों दिन-भर जोते जाते, डण्डे खाते, अडते। शाम को थान पर बाँध दिये
जाते, और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती। प्रेम के
इस प्रसाद को वह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों
दुर्बल न होते थे; मगर दोनों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा
हुआ था।
एक दिन मोती ने मूक भाषा में कहा- अब तो नही सहा जाता हीरा!
'क्या करना चाहते हो?'
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