Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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विप्र-जिस के घर से चाहो लाओ, मैं छटाँक-भर भी न छोड़ूँगा, यहाँ न
दोगे, भगवान् के घर तो दोगे?
शकर काँप उठा। हम पढ़े-लिखे आदमी होते, तो कह देते, अच्छी बात है,
ईश्वर के घर ही देगे, वहाँ की तौल यहाँ से कुछ बड़ी तो न होगी।
कम-से-कम इसका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं, फिर उसकी क्या चिन्ता।
किन्तु शंकर इतना तार्किक, इतना व्यवहार चतुर न था। एक तो ऋण-वह भी
ब्राह्मण का-बही में नाम रह गया तो सीधे नरक में जाऊँगा, इस खयाल ही
से उसे रोमांच हो पाया। बोला-महाराज, तुम्हारा "जितना होगा यहीं
दूँगा, ईश्वर के यहां क्यों दूँ, इस जनम में तो ठोकर 'खा ही रहा है,
उस जनम के लिए क्यों काँटे बोऊँ। मगर यह कोई नियाव नहीं है। तुमने
राई का पर्वत बना दिया, ब्राह्मण होके तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए
था। उसी घड़ी तगादा करके ले लिया होता, तो आज मेरे 'सिर पर इतना
बड़ा बोझ क्यों पड़ता! मै तो दे दूंगा, लेकिन तुम्हें भगवान् के
यहाँ जवाब देना पड़ेगा।
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