Livro · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
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Autor: प्रेमचंद
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विप्र-वहाँ का डर तुम्हें होगा, मुझे क्यो होने लगा। वहाँ तो सब
'अपने ही भाई-बंधु हैं। ऋषि-मुनि, सब तो ब्राह्मण ही हैं, देवता भी
ब्राह्मण हैं, जो कुछ बने-बिगड़ेगी, सँभाल लेंगे। तो कब देते हो!
शंकर-मेरे पास रखा तो है नहीं, किसी से माँग-जाँचकर लाऊँगा तभी न
दूंगा!
विप्र-मैं यह न माँनूगा। सात साल हो गये, अब एक दिन का भी मुलाहिजा
न करूँगा। गैहूँ नहीं दे सकते, तो दस्तावेज लिख दो। शंकर -- मुझे तो
देना है, चाहे गेहूँ लो, चाहे दास्तावेज लिखाओ, किस हिसाब से दाम
रखोगे।
विप्र -- बाजार -भाव पाच सेर का है, तुम्हे सवा सेर का काट दूँगा।
शंकर -- जब दे ही रहा हूँ तो बाजार -भाव काटूँगा , पावभर छुङा कर
क्यों दोषी बनूँ।
हिसाब लगाया गया तो गेहूँ के दाम ६०) हुए। ६०) का दास्तावेज लिखा
गया , ३०) सैकङे सूद। साल-भर में न देने पर सूद का दर २।।) सैकङे।
।।) का स्टाम्प , १) दास्तावेज की तहरीर शंकर को ऊपर से देनी पङी।
गाँव-भर ने विप्रजी की निन्दा की, लेकिन मुँह पर नहीं। महाजन से सभी
का काम पङता है, उसके मुँह कौन आये।
( २ )
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