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Sayfa 108 / 251

Yazar: प्रेमचंद

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अबकी भाई साहब बहुत कुछ नर्म पड़ गये थे। कई बार मुझे डाँटने का
अवसर पाकर भी उन्होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे
थे कि मुझे डाँट का अधिकार उन्हें नहीं रहा, या रहा, तो बहुत कम।
मेरी स्वच्छंदता भी बढ़ी। मैं उनकी सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाने
लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मै तो पास हो ही जाऊँगा, पढूंँ या न
पढूँ, मेरी तकदीर बलवान है। इसलिए भाई साहब के डर से जो थोड़ा-बहुत
पढ़ लिया करता था, वह भी बन्द हुआ। मुझे कनकौए उड़ाने का नया शौक
पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था; फिर भी
मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था।
माँझा देना, कन्ने बाँधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियाँ आदि
समस्याएँ सब गुप्त रूप से हल की जाती थीं। मैं भाई साहब को यह
सन्देह न करने देना चाहता था कि उनका सम्मान और लिहाज मेरी नजरों
में कम हो गया है।

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