Diller

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Sayfa 109 / 251

Yazar: प्रेमचंद

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एक दिन सन्ध्या समय होस्टल से दूर मैं एक कनकौआ लूटने बेतहाशा दौड़ा
जा रहा था। आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर,
'जो मन्द गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानों कोई आत्मा
स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नये संस्कार ग्रहण करने जा रही हो।
बालकों की एक पूरी सेना लग्गे और झाङदार बाँस लिये उसका स्वागत करने
को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानों
उस पतंग के साथ आकाश में उड़ रहे थे, जहाँ सब कुछ समतल है, न
मोटरकारें हैं न ट्राम, न गाङियाँ।

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