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Yazar: प्रेमचंद

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सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड़ हो गयी, जो शायद बाजार से लौट रहे
थे। उन्होंने वहीं मेरा हाथ पकड़ लिया और उग्र भाव से बोले इन
बाजारी लौंडों के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्हें शर्म
नहीं आती? तुम्हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं
हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो; और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो।
आखिर आदमी को कुछ तो अपने पोजीशन का खयाल करना चाहिए। एक जमाना था
कि लोग आठवाँ दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही
मिडिलचियों को जानता हूँ, जो आज अव्वल दरजे के डिप्टी मैजिस्ट्रेट
या सुपरिटेंडेंट हैं। कितने ही आठवीं जमाअतवाले हमारे लीडर और
समाचार-पत्रों के सम्पादक हैं। बड़े-बड़े विद्वान् उनकी मातहती में
काम करते हैं। और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौडों के साथ
कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्हारी इस कमअकली पर दुःख होता
है। तुम जहीन हो, इसमें शक नहीं, लेकिन वह जहन किस काम का, जो हमारे
आत्मगौरव की हत्या कर डाले?

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