Diller

Klavye

Sayfa 53 / 251

Yazar: प्रेमचंद

Süre0:00
Hız (WPM)0.0
Doğruluk100.0%

Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla. · Backspace devre dışı — yanlış yazsan da devam et.

सन्ध्या समय दोनों बैल अपने नये स्थान पर पहुँचे। दिन-भर के भूखे
थे; लेकिन जब नाँद में लगाये गये, तो एक ने भी उसमें मॅुह न डाला।
दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे
छूट गया था। यह नया घर, नया गाँव, नये आदमी सब उन्हें बेगाने-से
लगते थे।
दोनों ने अपनी मूक भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा
और लेट गये। जब गाँव में सोता पड़ गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे
तुड़ा डाले और घर की तरफ चले! पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता
था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगा; पर इन दोनों में इस समय दूनी
शक्ति आ गयी थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गयीं।
झूरो प्रातःकाल सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं।
दोनों की गरदनों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। घुटनों तक पाँव
कीचड़ से भरे हैं; और दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा
है।
भूरी बैलो को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा
लिया। प्रेमालिंगन और चुंबन का वह दृश्य बड़ा ही मनोहर था।

Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla.

Başlatılmadı