Kitap · प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
Sayfa 66 / 251
Yazar: प्रेमचंद
Süre0:00
Hız (WPM)0.0
Doğruluk100.0%
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla. · Backspace devre dışı — yanlış yazsan da devam et.
मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा--तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो
हीरा? हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे। आज तुम विपत्ति में पड़
गये, तो मै तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ? हीरा ने कहा-बहुत मार
पड़ेगी। लोग समझ जायेंगे, यह तुम्हारी शरारत है।
मोती गर्व से बोला-जिस अपराध के लिए तम्हारे गले में बंधन पड़ा,
उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिन्ता। इतना तो हो ही गया
कि नौ-दस प्राणियो की जान बच गयी। वह सब तो आशीर्वाद देंगे।
यह कहते हुए मोती ने दोनो गधों को सींगों से मार-मारकर बाड़े के
बाहर निकाला और तब अपने बन्धु के पास आकर सो रहा।
भोर होते ही मुंशी और चौकीदार और अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली
मची, इसके लिखने को जरूरत नहीं। बस इतना ही काफी है कि मोती को खूब
मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया।
( ६ )
एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बंधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक
तृण भी न डाला। हाँ, एक बार पानी दिखा दिया जाता था। यही उनका आधार
था। दोनो इतने दुर्बल हो गये थे कि उठा तक न जाता था। ठठरियाँ निकल
आयी थीं।
Başlat düğmesine bastıktan sonra yazmaya başla.
Başlatılmadı